Saturday, 11 February 2017

Hizla Mela, Dumka

Hizla Mela Dumka, Article in Hindi

झारखण्ड के संताल परगना का हिजला मेला

झारखण्ड राज्य के संताल परगना के दुमका जिले के मयुराक्षी नदी के किनारे के पहाड़ की तलहटी में प्रत्येक वर्ष भारतीय पञ्चांग के अनुसार फाल्गुन माह के वसंत ऋतु के शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार के दिन आठ दिवसीय एक मेले का आयोजन किया जाता है जिसका समापन समारोह भी शुक्रवार के दिन ही होता है. वह हिजला मेला के नाम से लोक ख्यात है।
वस्तुतः इस मेले का आरम्भ सन् 3 फरवरी. 1890 ई. से हुआ है। इसकी पृष्ठभूमि सन् 1855-56 का संताल विद्रोह है जिसमें हजारों की संख्या में संताल समुदाय के लोग शहीद हुए थे। इस विद्रोह का ने तृत्व सिदो-कान्हु, तिलका मॉझा आदि जैसे संताल सपूतों ने किया था। इतिहास साक्षी है कि पलाशी युद्ध में ईस्ट इण्डिआ कम्पनी से इस्लामी शासक की हार के बाद धीरे-धीरे ईस्ट इण्डिआ कम्पनी से  भारत का शासन भार ब्रितानी सरकार के हाथ में चला गया। ब्रितानी सरकार ने भारत में प्राचीन काल से चली आ रही आर्य दमनकारी शासन-व्यवस्था को नए ढंग से नई तकनीकी के माध्यम से सुधरने का प्रयास किया। इस व्यवस्था में शिक्षा, परिवहन आदि प्रमुख हैं।
भारत मुख्यतः गाँवों का देश है। इसकी अधिकांश जनता गॉंव में ही रहती है। गॉंव के लोगो की जीविका के प्रमुख साधन कृषि कार्य है। भारत मुख्यतः आर्येतर (गैर आर्य) जातियों का देश रहा है। भारत में आर्यों का आगमन मध्य एसिया में युरोसिया से उत्तर भारत के कश्मीर से होते हुए पुरे  भारत में हुआ है। आर्येतर जातियों की जीविका के मुख्य साधन कृषि कार्य ही था। जब ब्रितानी शासक भारत में आए तब उन्होंने अपनी शासन व्यवस्था का अच्छी तरह से संचालित करने के लिएनियम कानून बनाए जो आज भी अधिकांश क्षेत्रों में ब्रितानी सरकार के द्वारा बनाए गए नियम-कानून के प्रयोग  होते हैं। संताल विद्रेह के कई कारणों में मुख्यतः हर चीज पर अपना कब्जा कर लेनेवालो में निष्ठुर आर्य महाजन और आर्य सामंतों, जमींदारों का शोषण था। अन्य जनजातियों की भॅांति संताल जनजाति भी मुख्यतः कृषि निर्भर जनजाति है। जनजातियों के लिए भूमि न केवल आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराती है बल्कि अपने पूर्वेजों के संबंध रखने का एक शक्तिशाली सूत्र भी है। अपने पूर्वजों के प्रति संताल अत्यधिक श्रद्धेयवान होते हैं। किसी भी भूमि का स्वामित्व ग्रहण करना अथवा नए गॉंव की स्थापना के लिए स्थान का चयन तब तक नहीं किया जाता है जब तक कि अपने देवी-देवताओं से उसके लिए अपनी अनुमति नहीं प्राप्त कर ली जाती। इस प्रकार जनजाति के लिए भूमि आर्थिक विरासत के अतिरिक्त दैवी विरासत का भी भाग है। जनजातियों की परम्परा के अनुसार अधिकतर भूमि पर सम्पूर्ण ग्राम का अधिकार होता है। उनके लिए व्यक्तिगत भू-स्वामित्व की अवधारणा की जानकारी नहीं थी।
ब्रितानी सरकार ने जनजातियों की भूमि की आर्य सामंतों से सुरक्षा के लिए 22 दिसम्बर, 1855 ई. में अधिनयम संख्या 37 के अनुसार दामिन-ए-कोह और आसपास के क्षेत्रों को गैर विनियमित क्षेत्र (Non-Exchangeable Zone) बना दिया जिसका नाम संताल परगना काश्तकारी अधिनियम दिया गया। (वर्तमान भा. ज. पा. सरकार ने इस नियम में फेर बदल कर संतालों कि जमीन हथियाने का आर्यों का रास्ता साफ़ कर दिया है)

जनजाति समुदाय के लोग शांतिप्रिय प्रकृति के होते हैं। इस समुदाय की अधिकांश संख्या अशिक्षित, अनपढ होने के कारण इन्हों ने अनुभव किया या कराया गया कि ब्रितानी शासक हमारी शांति व्यवस्था को भंग करना चाहती हैं। इसलिए इनलोगों के लिए पारित अधिनियम को समझाने के लिए तत्कालीन उपायुक्त जॉन रॉबर्ट कास्टेयसर् ने दिनांक 3 फरवरी, 1890 को जनजातियों में विशेषकर संताल समुदाय के लिए प्रकृति से अच्छादित मयुराक्षी नदी के किनारे पहाड़ की तलहटी में एक सभा का आयोजन किया जिसमें संताल परगना के संताल जनजाति के लोग आकर सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन में उपायुक्त जॉन रॉबर्ट कास्टेयर्स ने उनके कानून (His Law) को समझाने की व्यवस्था की। वही हिज लॉ उच्चारण की सुविधा के कारण हिजला मेला के नाम से लोक पचलित हुआ है। धीरे-धीरे इस मेले का विकास होता गया जिसमें दुमका जिले के संताल जनजाति, जिनकी संख्या अन्य जनजातियों से अधिक है उनका समागम होता गया। साथ-साथ इसमें इनकी संस्कृति की झॉंकी मुख्य रुप से प्रदर्शित की जाने लगी। इसका अवलोकन करते हुए सन् 1977 ई. दुमका के तत्कालीन उपायुक्त ने हिजला के साथ जनजातीय जोड़ दिया। इसके बाद यह मेला जनजातीय हिजला मेला के नाम से प्रचलित हुआ।
सन् 14 नवम्बर, 2000 इ० को बिहार से विभाजित झारखण्ड नामक राज्य का गठन हुआ। झारखण्ड राज्य गठित होने के बाद झारखण्ड सरकार ने झारखण्ड में आयोजित होनेवाले कई पुराने मेले का राजकीय मेला के रुप में घोषित किया। इस प्रकार सन् 19 फरवरी 2016 से 26 फरवरी, 2016
तक आयोजित होनेवाले आठ दिवसीय मेले का नाम राजकीय जनजाति हिजला मेला महोत्सव के नाम से प्रचारित हुआ है। किंतु मेले के स्वरुप में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अभी भी इस मेले को देखने के बाद संताल जनजाति की संस्कृति का परिचय सहज रुप में मिलता है।
इस मेले के संबंध में एक आम धारणा प्रचलित है कि अगर कोई राजनेता आकर इस मेले का उद्घाटन करता है तब उन्हें अपनी राजगद्दी खोनी पड़ती है। इसलिए इस मेले का उद्घाटन मेला स्थल के निकट के गॉंव के रहनेवाले संताल जाति के ग्राम प्रधान जिसे संताली भाषा में माझि हराम कहते हैं वही इस मेले का उद्घाटन करते हैं। आजकल हिजला के नाम से मेला-स्थल के पास का गॉव भी हिजला ग्राम के नाम से प्रचलित है।

इस मेले की विशेषता यह है कि इसमे जनजातियों के संताल  समुदाय की संस्कृति के उपादान नृत्य-गीत, खेलकूद, संताली परिधान पंछी आदि की झलक मिलती है।











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